Wednesday, 20 February 2013


आठवीं अनुसूची में शामिल होगी छत्तीसगढ़ी
भिलाई। छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष दानेश्वर शर्मा ने बताया कि छत्तीसगढ़ी के संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त हो चुका है तथा लोकसभा के इसी सत्र में यह महत्वपूर्ण कार्य हो जाने की संभावना है।
श्री शर्मा ने बताया कि इसके लिए राज्य विधान सभा में पहले ही संकल्प पारित हो चुका है। आयोग ने सभी सांसदों को पत्र लिखकर छत्तीसगढ़ को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने में सहयोग प्रदान करने के लिए कहा था। सांसद सरोज पाण्डेय ने इस मामले को लोकसभा में उठाया जिसपर सांसदों ने इसपर सहमति व्यक्त करते हुए विधेयक पेश करने का सुझाव दिया था। यह विधेयक तैयार हो चुका है और संसद के बजट सत्र में ही इसके पेश होने तथा पारित होने की संभावना है।
राजभाषा आयोग के क्रियाकलापों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि आज नहीं तो कल छत्तीसगढ़ में राजकाज की भाषा छत्तीसगढ़ी होगी। इसके लिए वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को भी इस भाषा की जानकारी प्राप्त करनी ही होगी। आयोग के प्रयासों से हिन्दी एवं अंग्रेजी से छत्तीसगढ़ी में अनुवाद के लिए प्रशासनिक शब्द कोश तैयार कर लिये गये हैं।  इसके अलावा ऐसे लोगों को छत्तीसगढ़ी में टिप्पणी लेखन का प्रशिक्षण देने की भी व्यवस्था की गई है जो इसके इच्छुक हों।
लोकसेवा आयोग में छत्तीसगढ़ी
श्री शर्मा ने बताया कि आयोग ने छत्तीसगढ़ लोकसेवा आयोग को छत्तीसगढ़ी के कुछ प्रश्न पूछने का सुझाव दिया था। आयोग ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है तथा लोकसेवा आयोग की अगली परीक्षा के प्रथम प्रश्न पत्र के भाग-4 में छत्तीसगढ़ तथा छत्तीसगढ़ी से संबंधित प्रश्न पूछे जाएंगे। इन प्रश्नों में छत्तीसगढ़ी भाषा ज्ञान, साहित्य, साहित्यकार, विकास, इतिहास, व्याकरण आदि के सवाल होंगे। इससे छत्तीसगढ़ी युवाओं को लाभ होगा।
उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ी को प्रोत्साहित करने के लिए आयोग ने कुछ और भी उपाय किये हैं। माई कोठी योजना इसमें प्रमुख है। इस योजना के तहत छत्तीसगढ़ में लिखी गई किसी भी पुस्तक की दो प्रतियां आयोग द्वारा क्रय की जाएगी। इसके अलावा छत्तीसगढ़ पर प्रकाशित किसी भी अन्य भाषा की दो पुस्तकों को खरीदने का भी प्रावधान किया गया है।
आयोग ने बिजहा योजना भी शुरू की है जिसके तहत छत्तीसगढ़ी के विलुप्त हो रहे शब्दों को संजोने का कार्य किया जा रहा है। प्रांत के विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली बोलियों के ऐसे शब्दों को संकलित किया जा रहा है जिसे अब बहुत कम इस्तेमाल में लाया जा रहा है। 750 से अधिक ऐसे शब्दों का संकलन किया जा चुका है तथा कार्य जारी है।
हिन्दी से पुराना छत्तीसगढ़ का व्याकरण
श्री शर्मा ने बताया कि छत्तीसगढ़ एक अत्यंत प्राचीन भाषा है तथा इसका व्याकरण हिन्दी से भी पहले बन चुका था। हिन्दी पहले खड़ी बोली कहलाती थी तथा इसका पहला व्याकरण पुस्तक पं. कामता प्रसाद गुरू ने 1910 में प्रकाशित किया। जबकि इससे 20 साल पहले ही 1890 में छत्तीसगढ़ी का संशोधित व्याकरण प्रकाशित हो चुका था। उन्होंने बताया कि 1885 में हीरालाल काव्योपाध्याय ने छत्तीसगढ़ी की पहली पुस्तक लिखी जिसे सर जार्ज ग्रेयरसन ने अंग्रेजी में अनुवाद किया। बाद में पं. लोचन प्रसाद पाण्डे ने इसे संवद्र्धित एवं संशोधित किया तथा 1990 में इसका प्रकाशन किया।
लोगों में उत्साह
धमतरी के जिलाधीश एनएस मंडावी का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि श्री मंडावी ने स्वस्फूर्त होकर अपने मातहतों को लोगों से छत्तीसगढ़ी में वार्तालाप करने के निर्देश दिए हैं।
42 बोलियों का समावेश
दानेश्वर शर्मा ने बताया कि छत्तीसगढ़ी से आशय उन सभी बोलियों तथा भाषाओं से है जिन्हें छत्तीसगढ़ प्रांत में बोला जाता है। इसमें दुर्ग-रायपुर, राजनांदगांव, बिलासपुर में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी के अलावा सरगुजिहा, हल्बी, गोंडी आदि अन्य भाषाएं भी शामिल हैं। हमें इन सभी के अलावा उन सभी शब्दों का दिल खोलकर स्वागत करना है जिनका छत्तीसगढ़ में आम बोलचाल की भाषा के रूप में स्वागत किया जा रहा है।
विलुप्त हो रहे शब्द
विलुप्त हो रहे शब्दों की चर्चा करते हुए पं. शर्मा ने बताया कि गांव में पुरुषों द्वारा पहनी जाने वाली पादुका को भंदई कहते हैं। इसी तरह महिलाओं की पादुका को अकतरिया कहते हैं पर इस शब्द का अब बहुत कम उपयोग हो रहा है। इसी तरह का एक शब्द बैलगाडिय़ों को पहिए से बनने वाले रास्तों के लिए उपयोग किया जाता है खोलदावन कहा जाता था। यह शब्द भी अब विलुप्त हो रहा है।

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