नीतीश ने यदि नरेन्द्र मोदी का विरोध करते हुए भाजपा से दूरी बनाई है तो इसके पीछे ठोस वजहें हैं। नीतीश को राजनीति का ग्रेट गैंबलर यूं ही नहीं कहा जाता। नीतीश ने देख लिया है कि यदि मोदी उनके करीब आते हैं तो खुद बिहार में उनके लिए विधानसभा चुनाव जीतना मुश्किल हो जाता है। 2004 के लोकसभा चुनाव में वो इसका स्वाद भी चख चुके हैं। जब गुजरात में दंगे हुए। गोधरा में ट्रेन पर हमला किया गया, उस समय अटल बिहारी सरकार में खुद नीतीश रेल मंत्री थे। इस घटना के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने तो अपनी पीड़ा व्यक्त की किन्तु नीतीश खामोश रहे थे। इसके बाद लोकसभा में बिहार के मुसलमानों ने उन्हें सबक सिखा दिया। यहां भाजपा-जदयू की युति को 40 में से सिर्फ 11 सीटें मिल पार्इं। नीतीश ने इससे सबक लिया और अगले साल 2005 में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान मोदी को बिहार से दूर रखा। नतीजा फिर शीशे की तरह साफ था। नीतीश ने भारी बहुमत से यह चुनाव जीता।
ये तो हुई अल्पसंख्यक वोटों के ध्रुवीकरण की बात। बिहार में अल्पसंख्यक वोटों की संख्या 17 फीसदी है। इसमें से 80 फीसदी पिछड़े यानी कि पसमांदा मुसलमान हैं। इस वोटबैंक पर नीतीश की प्रतिस्पर्धा लालू की पार्टी राजद से है। मोदी का खुलेआम विरोध कर नीतीश ने लालू से यह बाजी संभवत: जीत ली है।
अब आती है अगड़ों की बात। बिहार में अगड़ों का प्रतिशत अल्पसंख्यकों से कुछ ज्यादा, 21 प्रतिशत है। माना जाता है कि 13 फीसदी अगड़े वोटों पर भाजपा का एकाधिकार है। जदयू के 20 सांसदों की जीत में भाजपा के अगड़े वोटों का बड़ा हाथ है। विधानसभा में भी अगड़ों का खासा प्रतिनिधित्व है और उनकी संख्या निरंतर बढ़ रही है। 2000 में जहां 56 अगड़े विधायक थे वहीं 2005 में इनकी संख्या 59 हो गई। अभी यहां की कुल 243 सीटों में से 76 पर अगड़े ही काबिज हैं। नीतीश ने भाजपा से इतर इन लोगों को साधने की शुरुआत बहुत पहले ही कर दी है। पिछले विधानसभा चुनाव के पहले नीतीश ने सवर्ण आयोग का वादा किया। चुनाव जीतते ही उन्होंने सवर्ण आयोग गठित भी कर दिया। अगड़ों को लुभाने के लिए वो बिहार के सुशासन को भी सामने रखते हैं। अपराध पर काबू पाकर उन्होंने सवर्णों में सुरक्षा का अहसास मजबूत किया है।
राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश यह भली भांति जानते हैं कि मोदी के मजबूत होने का मतलब खुद नीतीश या जदयू का कमजोर होना है। यदि मोदी पीएम बन जाते हैं तो आज नहीं तो कल बिहार में उसे नीतीश के कई विकल्प मिल जाएंगे। नीतीश को यह कदापि मंजूर नहीं। नीतीश ने 17 साल पहले यदि आडवाणी और वाजपेयी के साथ मिलकर एनडीए बनाया था तो उसकी कीमत भी रेलमंत्री बनकर वसूली थी। वे राजनीति के कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। जो भाजपा के पावर को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रहे हैं वे बस यहीं गच्चा खा जाते हैं। मोदी के लिए यूपी की डगर कभी आसान नहीं रही। बिहार में भी नीतीश ‘मोदी नहीं तो मोदी से कमतर भी नहीं’ की पोजीशन बना चुके हैं। इन दोनों राज्यों को हाशिए पर डालकर यदि भाजपा केन्द्रीय सियासत के बारे में सोच रही है तो नेता प्रतिपक्ष की सीट उसे खाली मिल सकती है। दरअसल नीतीश ने मोदी पर ही दांव खेला है। यदि गठजोड़ तोड़ने का उन्हें कुछ नुकसान भी हुआ तो यह धर्मनिरपेक्ष बने रहने की कीमत समझी जाएगी जबकि यदि मोदी हार गए तो अकेले उनका ही नहीं खुद भाजपा का चैप्टर खतरे में पड़ जाएगा।

No comments:
Post a Comment