Wednesday, 10 September 2014

छत्तीसगढ़ की 102 वनौषधियों को ड्रग लाइसेंस

'छत्तीसगढ़ हर्बल्स' ब्रांड को मिल रहा अच्छा प्रतिसाद

महिला समूह और ग्रामीण समितियां बना रहीं आयुर्वेदिक औषधियां
राजधानी रायपुर के संजीवनी केन्द्र में तीन गुना बढ़ी बिक्री
रायपुर। राज्य के वनौषधि प्रसंस्करण केन्द्रों में तैयार की जा रही 102 आयुर्वेदिक वनौषधियों को छत्तीसगढ़ सरकार के आयुष विभाग द्वारा ड्रग एवं कासमेटिक एक्ट के अनुसार लाइसेंस भी मिल गया है। 'छत्तीसगढ़ हर्बल्स' के ब्रांड पर की जा रही इनकी मार्केटिंग के लिए राज्य में छह स्थानों पर गैर काष्ठीय वनोपज मार्ट और 32 स्थानों पर संजीवनी केन्द्रों की स्थापना की गई है। दुर्ग, बिलासपुर, अम्बिकापुर, कांकेर और जगदलपुर में भी संजीवनी रिटेल आउटलेट संचालित किए जा रहे हैं।
वन सम्पदा से परिपूर्ण राज्य के वनों में लोगों को जीवन देने वाली मूल्यवान आयुर्वेदिक वनौषधियों का व्यावसायिक उत्पादन भी शुरू हो गया है, जो विभिन्न बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए रामबाण साबित हो रही हैं। इस कार्य में स्थानीय वनवासी परिवारों को रोजगार भी मिल रहा हैै। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की नीति के अनुरूप ग्राम वन समितियों और महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा वनौषधियों का संग्रहण कर उनका प्रसंस्करण किया जा रहा है। यह कार्य लघु एवं कुटीर उद्योग के रूप में हो रहा है। राज्य के 27 में से 5 जिलों में सात स्थानों पर वनौषधि प्रसंस्करण केन्द्र स्थापित किए गए हैं। तैयार वनौषधियों को आकर्षक पैकेजिंग के साथ 'छत्तीसगढ़ हर्बल्स' के ब्रांड नाम से बाजार में उतारा गया है। इस ब्रांड को आयुर्वेदिक डॉक्टरों, मरीजों और ग्राहकों का अच्छा प्रतिसाद मिल रहा है।
रायपुर में गांधी उद्यान के समीप स्थित 'संजीवनी' में 2013-14 में इन वनौषधियों की लगभग 34 लाख 77 हजार रूपए की बिक्री हुई। रायपुर के संजीवनी रिटेल आउटलेट में नौ साल में करीब दो करोड़ 17 लाख रूपए की वनौषधियों की बिक्री हो चुकी है।
ये हैं औषधियां - चूर्ण, अवलेह, तेल और पाक
त्रिफला चूर्ण, पंचसम चूर्ण, शतावरी चूर्ण, मधुमेहांतक चूर्ण, पायोकिल (दंत मंजन), सर्दी-खांसी नाशक चूर्ण, हर्बल कॉफी चूर्ण, हर्बल मधुमेह नाशक चूर्ण, फेसपेक चूर्ण, केशपाल चूर्ण, गुड़मार चूर्ण, सपर्गंधा चूर्ण, गिलोय चूर्ण, नीमपत्र चूर्ण, दर्द निवारक महाविष गर्भ तेल सहित भृंगराज तेल, अश्वगंधा चूर्ण, तुलसी चूर्ण, च्यवनप्राश, कौंचपाक और वासअवलेह भी बनाया जा रहा है। कुछ केन्द्रों में शहद का भी उत्पादन हो रहा है। उल्लेखनीय है कि ये सभी वनौषधियां कई प्रकार के बीमारियों के इलाज में कारगर साबित हो रही है, जैसे गिलोय चूर्ण का इस्तेमाल चमर्रोग, वातरक्त ज्वर, पीलिया और रक्ताल्पता (एनिमिया) में काफी उपयोगी है। तुलसी चूर्ण का उपयोग सर्दी-खांसी, कृमिरोग, नेत्र रोग आदि में किया जा सकता है। जामुन-गुठली चूर्ण का इस्तेमाल मधुमेह की बीमारी में काफी लाभदायक है। जोड़ों के दर्द, कमर दर्द, बदन दर्द आदि वात रोगों में महाविषगर्भ तेल का उपयोग किया जा सकता है। च्यवनप्राश का उपयोग शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने में किया जा सकता है।

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